द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत :
प्रथम विश्वयुद्ध : 1914 - 1918
द्वितीय विश्वयुद्ध : 1939 - 1945
मित्र राष्ट्र : अमरीका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस
धुरी राष्ट्र : जर्मनी, इटली, जापान
द्वितीय विश्वयुद्ध का अंत अगस्त 1945 में हुआ, जब अमेरिका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराया।
हिरोशिमा - 6 अगस्त 1945 - लिटिल बॉय
नागासाकी - 9 अगस्त 1945 - फैट मैन
बमों की क्षमता 15-21 किलोमीटर टन थी।
👉 अमेरिका की आलोचना :
अमेरिका इस बात को जनता था कि जापान आत्मसमर्पण करने वाला है। ऐसे में बम गिराने की आवश्यकता नहीं थी।
👉 अमेरिका का पक्ष :
अमेरिका के समर्थकों का तर्क था कि युद्ध को जल्दी से जल्दी समाप्त करने और मित्र राष्ट्रों की आगे की जनहानि को रोकने के लिए परमाणु बम गिरना जरूरी था।
👉 हमले के पीछे का उद्देश्य :
अमेरिका सोवियत संघ के सामने यह भी जाहिर करना चाहता था कि अमेरिका ही विश्व की सबसे बड़ी ताकत है।
शीतयुद्ध का आरंभ :
👉 द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के साथ ही वैश्विक राजनीति के मंच पर दो महाशक्तियों ( अमेरिका और सोवियत संघ ) का उदय हो गया ।
👉 अमेरिका और सोवियत संघ महाशक्ति बनने की होड़ में दोनों एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए जिससे शीतयुद्ध का आरंभ हुआ।
👉 दोनों महाशक्तियों के पास इतने परमाणु हथियार थे कि दोनों एक-दूसरे को असहनीय क्षति पहुँचा सकते थे।
👉 ऐसी स्थिति में दोनों महाशक्तियों में से कोई भी युद्ध का जोखिम नहीं मोल लेना चाहता था क्योंकि युद्ध की स्थिति में विजेता चाहे जो भी होता लेकिन युद्ध से दोनों को ही बहुत बड़ी जनहानि का सामना करना पड़ता।
👉 अगर कोई भी महाशक्ति किसी दूसरे पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथियारों को नाकाम करने की कोशिश करता था तब भी दूसरे के पास उसे बर्बाद करने के लिए हथियार बच जाएंगे। इस स्थिति को ‘अवरोध’ - ( रोक और संतुलन ) कहा गया।
क्यूबा मिसाइल संकट :
👉 क्यूबा USA का पड़ोसी द्वीपीय देश है। यहाँ फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई।
👉 क्यूबा का जुड़ाव सोवियत संघ से था। सोवियत संघ उसे सैन्य और वित्तीय सहायता प्रदान करता था। अमेरिका नहीं चाहता था कि क्यूबा में साम्यवादी शासन स्थापित हो।
👉 1962 में सोवियत संघ के राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी जो कि अमेरिका के लिए खतरा था।
👉 अमेरिका को इसकी जानकारी 3 हफ़्ते बाद मिली। तब अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ऐसा कोई भी कदम उठाने से घबरा रहे थे जिससे दोनों के मध्य युद्ध हो। अतः कैनेडी ने आदेश दिया कि सोवियत संघ के जहाजों को क्यूबा तक आने से रोका जाए और क्यूबा की चारों ओर से नाकेबंदी की जाए।
👉 इस घटना से दोनों देश युद्ध की कतार पर आ गए थे। यह शीतयुद्ध की चरम-सीमा थी।
👉 अंत में दोनों ने सूझ-बूझ से काम लिया। सोवियत संघ ने क्यूबा से परमाणु मिसाइलें हटा ली और अमेरिका ने नाकेबंदी समाप्त कर दी। इसे ही ‘क्यूबा मिसाइल संकट’ कहा जाता है।
शीतयुद्ध या दो-ध्रुवीय विश्व के आरंभ के कारण :
👉 शीतयुद्ध की परिभाषा :
युद्ध न होकर युद्ध की संभावना बने रहना, शीतयुद्ध कहलाता है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद विश्व दो खेमों ( अमेरिका और सोवियत संघ ) में विभाजित हो गया। इससे ही शीतयुद्ध का आरंभ हुआ।
👉शीतयुद्ध के आरंभ होने के कारण :
➡️ विचारधारा सम्बंधित विभेद :
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद दो महाशक्तियों का उदय हुआ। जहाँ अमेरिका पूंजीवादी विचारधारा का समर्थन कर रहा था तो वहीं सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा का समर्थन कर रहा था।
➡️ दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप :
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी यूरोप के अधिकतर देशों ने अमेरिका का पक्ष लिया जबकि पूर्वी यूरोप के अधिकतर देशों ने सोवियत संघ का समर्थन किया।
➡️ सैन्य-गुटों का निर्माण :
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सैन्य-गुटों के निर्माण होने लगा था। 4 अप्रैल 1949 को अमेरिका ने NATO
( North Atlantic Treaty Organization - उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन ) की स्थापना की। इसमें अमेरिका सहित यूरोप के 12 देश शामिल थे। इस संगठन ने घोषणा की कि अगर किसी एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा और सभी एक-दूसरे की मदद करेंगे।
वहीं पूर्वी यूरोप के देशों ने सोवियत संघ के नेतृत्व में 1955 ‘ वारसा पैक्ट ‘ नामक संगठन बनाया। यह नाटो के विरोध में बनाया गया था।
➡️ संयुक्त राष्ट्र संघ का कमजोर होना :
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी लेकिन यह भी शीतयुद्ध को रोकने में कमजोर साबित हुआ।
➡️ अस्त्र-शस्त्र की होड़ :
दोनों गुटों में अस्त्र-शस्त्र की होड़ आरंभ हो गई । दोनों ने परमाणु बम बना लिए जिससे शीतयुद्ध को बढ़ावा मिला।
➡️ विश्व के विभिन्न हिस्से में प्रभाव का बढ़ता दायरा :
दोनों महाशक्तियाँ चाहती थी कि विश्व के विभिन्न हिस्सों में उनकी विचारधारा का प्रभाव बढ़े। जहाँ अमेरिका इस बात का प्रयास कर रहा था कि नव-स्वतंत्र देश पूंजीवादी विचारधारा अपनाए, वहीं सोवियत संघ साम्यवादी विचारधारा का प्रयास कर रहा था।
महाशक्तियों को छोटे देशों से होने वाला लाभ
👉 महत्वपूर्ण संसाधन :
महाशक्तियाँ छोटे देशों के प्राकृतिक संसाधनों जैसे : तेल, खनिज आदि का दोहन करना चाहती थीं।
👉 भू-क्षेत्र का उपयोग :
महाशक्तियाँ छोटे देशों के भू-क्षेत्र का उपयोग हथियारों के संचालन के लिए करना चाहती थी, उदाहरण के लिए : क्यूबा ।
👉 सैन्य ठिकाने बनाना :
दोनों गुट एक-दूसरे की जासूसी करने के लिए छोटे देशों के साथ गठबंधन करना चाहती थी।
👉 आर्थिक मदद :
दोनों महाशक्तियों का मानना था कि वे छोटे देशों के सैन्य खर्चों को उठाने में मददगार हो सकते हैं।
शीतयुद्ध के दायरे
परिभाषा :
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 1945 में शीतयुद्ध का प्रारंभ हुआ और 1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद शीतयुद्ध का अंत हो गया। इस दौरान अनेक घटनाएँ घटित हुई जो शीतयुद्ध के दायरे में आती है ।
👉 कोरिया समस्या ( 1950-53 ) :
1950 से 1953 में उत्तरी कोरिया तथा दक्षिणी कोरिया में गृहयुद्ध हुआ। जहाँ अमेरिका ने दक्षिणी कोरिया का समर्थन किया तो वहीं उत्तरी कोरिया का समर्थन सोवियत संघ ने किया। भारत सहित अनेक देशों ने इस समस्या के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
👉 वियतनाम संकट :
वियतनाम पर फ्रांस का कब्जा था। दूसरे विश्वयुद्ध में इस पर जापान ने कब्जा कर लिया लेकिन जापान की दूसरे विश्वयुद्ध में हार के पश्चात फ्रांस ने वियतनाम पर फिर से आक्रमण किया और दायन-बीयन-फू के युद्ध में फ्रांस की हार हुई। इसके बाद ‘ जिनेवा समझौते ‘के तहत वियतनाम के दो भाग कर दिए गए : उत्तरी वियतनाम एव दक्षिणी वियतनाम ।
अमेरिका ने पूंजीवाद के प्रसार के लिए दक्षिणी वियतनाम का समर्थन किया। इसके बाद उत्तरी व दक्षिणी वियतनाम में युद्ध हुआ। अमेरिका ने भी इस युद्ध में हस्तक्षेप किया और हार गया। इसके बाद पूरे वियतनाम का एकीकरण हो गया।
👉 क्यूबा मिसाइल संकट :
1962 में सोवियत संघ ने अमेरिका पर हमला करने के लिए क्यूबा में मिसाइलें तैनात कर दी। अमेरिका को इस बात की ख़बर 3 हफ्ते बाद मिली। तब अमेरिका ने क्यूबा की नाकेबंदी कर दी जिसके कारण सोवियत संघ को मिसाइलें हटानी पड़ी। सोवियत संघ ने मिसाइल लगाने का यह तर्क दिया कि अमेरिका क्यूबा में साम्यवादी शासन का तख्तापलट करना चाहता था । क्यूबा मिसाइल संकट को शीतयुद्ध की चरम-बिंदु कहा जाता है।
👉 बर्लिन संकट :
दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार हुई और जर्मनी की राजधानी बर्लिन पर अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और सोवियत संघ का अधिपत्य स्थापित हुआ। जहाँ पश्चिमी जर्मनी में पूँजीवादी विचारधारा आई और पूर्वी जर्मनी में साम्यवाद स्थापित हुआ।
1961 में सोवियत संघ ने बर्लिन की दीवार खड़ी की । यह दीवार 1989 में टूटी और जर्मनी का एकीकरण हुआ।
👉 हंगरी समस्या ( 1955 ) :
यह समस्या सोवियत संघ द्वारा हंगरी में साम्यवादी विचारधारा थोपने के कारण उत्पन्न हुई थी।
👉 गुटनिरपेक्ष का निर्माण :
किसी भी गुट में शामिल हुए बिना अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं पर निष्पक्ष विचार प्रकट करना गुटनिरपेक्ष कहलाता है। गुटनिरपेक्ष आंदोलन के निर्माण में भारत, घाना, मिस्र, इंडोनेशिया एवं युगोस्लाविया जैसे नव-स्वतंत्र देशों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन
👉 किसी भी गुट में शामिल हुए बिना अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं पर निष्पक्ष विचार प्रकट करना, गुटनिरपेक्ष कहलाता है।
👉 दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब संसार दो गुटों में विभाजित हो गया तो एशिया, अफ्रीका एवं लेटिन अमेरिका के नव-स्वतंत्र देशों ने गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई।
👉 गुटनिरपेक्ष के निर्माण में भारत के प्रधनमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसेफ ब्रॉज़ टीटो, मिस्र के राष्ट्रपति गमाल अब्दुल नासिर एवं घाना के प्रधानमंत्री वामे एनक्रुमा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्य :
➡️ अंतर्राष्ट्रीय शांति स्थापित करना
➡️ साम्राज्यवाद एवं उपनिवेशवाद का अंत करना
➡️ अस्त्र-शस्त्र की होड़ को रोकना
➡️ परमाणु हथियारों का विरोध करना
➡️ सैनिक गुटों के विरोध करना
➡️ मानवाधिकारों का समर्थन करना
➡️ विश्व पर्यावरण सुरक्षा पर बल देना
➡️ नई अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की माँग करना
गुटनिरपेक्षता एवं तटस्थता
👉 गुटनिरपेक्षता :
★ गुटनिरपेक्ष का अर्थ होता है किसी भी गुट में शामिल हुए
बिना अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर निष्पक्ष विचार रखना।
★ गुटनिरपेक्ष का प्रयोग शांति और युद्ध दोनों के समय होता है।
★ गुटनिरपेक्ष देश यह देखते हैं कि किस प्रकार समस्या का
समाधान हो तथा शांति स्थापित हो।
★ यह एक सकारात्मक अवधारणा है ।
★ यह युद्ध के बारे में सही और गलत विचार प्रस्तुत करते हैं।
★ गुटनिरपेक्ष साहस की नीति है।
👉 तटस्थता :
★ तटस्थता का अर्थ होता है अपने को अंतर्राष्ट्रीय मामलों से काटकर रखना ।
★ तटस्थता का प्रयोग केवल युद्ध की स्थिति में होता है।
★ यह युद्ध से अलग रहने की नीति है।
★ यह एक नकारात्मक अवधारणा है।
★ तटस्थ देश युद्ध में शामिल नहीं होते और न ही युद्ध के बारे में सही या गलत विचार प्रस्तुत करते हैं।
★ तटस्थता कायरता की नीति है।
गुटनिरपेक्षता एवं पृथकतावाद
👉 गुटनिरपेक्षता :
∆ गुटनिरपेक्ष का अर्थ होता है किसी भी गुट में शामिल हुए बिना
अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर निष्पक्ष विचार रखना।
∆ गुटनिरपेक्ष में अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सम्बंध बना कर रखे जाते
हैं।
∆ गुटनिरपेक्ष देश शांति स्थापित करने के लिए मध्यस्थता की
नीति अपनाते हैं।
∆ दूसरे विश्वयुद्ध के बाद भारत सहित बहुत से नव-स्वतंत्र देशों ने
गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई।
👉 पृथकतावाद :
∆ पृथकतावाद का अर्थ होता है युद्ध में शामिल न होने की
नीति का पालन करना ।
∆ पृथकतावाद में अंतर्राष्ट्रीय मामलों से सम्बंध तोड़ दिए
जाते हैं ।
∆ इसमें विरोधी राष्ट्रों में मध्यस्थता की नीति नहीं अपनाई
जाती है।
∆ प्रथम विश्वयुद्ध से पहले अमेरिका ने यह नीति अपनाई थी।
नव-स्वतंत्र देशों या भारत ने गुटनिरपेक्ष की नीति क्यों अपनाई ?
👉 आर्थिक समस्या :
नव-स्वतंत्र देश कई प्रकार की आर्थिक समस्याओं से घिरे हुए थे। ऐसे में वे अगर किसी एक गुट में शामिल हो जाते तो वे दोनों महाशक्तियों से सहयोग नहीं ले पाते।
👉 अस्त्र-शस्त्र की होड़ :
नव स्वतंत्र देश अस्त्र-शस्त्र बढ़ाने के खिलाफ थे इसलिए उन्होंने गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई।
👉 स्वतंत्र विदेश नीति :
अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाने के लिए नव स्वतंत्र देशों ने गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई।
👉 उपनिवेशवाद का विरोध :
नव स्वतंत्र देश आज़ादी से पहले किसी न किसी यूरोपीय देश के उपनिवेश थे। आज़ादी के बाद उन्होंने उपनिवेशवाद का विरोध किया एवं गुटनिरपेक्ष की नीति अपनाई ।
👉 अंतर्राष्ट्रीय फैसले :
नव स्वतंत्र देश ( भारत ) गुटनिरपेक्ष की नीति के कारण ही ऐसे अंतर्राष्ट्रीय फैसले ले सके जिससे उनके हितों की पूर्ति हुई।
👉 अपनी स्थिति को मजबूत करना :
नव स्वतंत्र देश विशेषकर भारत को जब भी यह महसूस होता कि कोई भी महाशक्ति उसकी अनदेखी कर रही है तो भारत दूसरे गुट से सम्बंध बना कर अपनी स्थिति को मजबूत कर लेता ।
भारत के गुटनिरपेक्ष नीति की आलोचना
👉 बहुत से विद्वानों का मानना है कि भारत के गुटनिरपेक्ष की नीति सिद्धांतहीन है। भारत अंतर्राष्ट्रीय मामलों से बचना चाहता था इसलिए उसने यह नीति अपनाई।
👉 भारत की गुटनिरपेक्ष की नीति केवल उसके राष्ट्र के हितों की पूर्ति करती है।
👉 कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत का व्यवहार पूर्ण रूप से गुटनिरपेक्ष नहीं रहा। उदाहरण के लिए भारत ने 1971 में सोवियत संघ के साथ संधि की।
नव अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था
👉 गुटनिरपेक्ष के देश अविकसित और गरीब देश हैं।
👉 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के व्यापार और विकास से संबंधित सम्मेलन ( यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट - अंकटाड ) में ‘ टुवार्ड्स अ न्यू ट्रेड पॉलिसी फॉर डेवेलपमेंट - विकास के लिए नई व्यापारिक नीति की ओर’ शीर्षक के नाम से एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।
👉 इस रिपोर्ट में वैश्विक व्यापार-प्रणाली में सुधार का प्रस्ताव रखा गया और निम्न माँगे रखी गई :
➡️ पश्चिम देशों से मंगाई जा रही तकनीक की लागत कम हो
➡️ अल्पविकसित देशों का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर पूरा नियंत्रण हो
➡️ कम विकसित देशों की पहुँच भी पश्चिमी देशों के बाजारों तक हो ताकि वे भी अपना समान वहाँ बेच सके
➡️ अल्पविकसित देशों की अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थानों में भूमिका बढ़ाई जाए
शीतयुद्ध के दौरान हुई संधियाँ
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